Wednesday, 17 December 2025

 सूखी डाली एकांकी 




सूखी डाली  - पात्र परिचय 

दादा- मूलराज (परिवार का मुखिया)
कर्मचन्द - मंझला बेटा
परेश -सबसे छोटा पोता
इंदु - पोती, प्राइमरी शिक्षा प्राप्त
बेला - परेश की पत्नी, छोटी बहू
छोटी भाभी -  इंदु की माँ, बेला की सास
मंझली भाभी, बड़ी भाभी, बड़ी बहू, मंझली बहू, रजवा (मिसरानी), पारो

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शब्दार्थ

तानाशाही - निरंकुश शासन; प्रभुत्व - आधिपत्य; वट- बरगद; प्रण- प्रतिज्ञा; ग्रेजुएट- स्नातक;

कोलाहल - शोर; स्नानागार - गुसलखाना; निस्तब्धता - स्थिरता; भृकुटी- भौहें; 

पतोहू- पोते की पत्नी; स्तम्भित आश्चर्यचकित; दर्प - घमण्ड; नीरवता - सन्नाटा;

बरबस - अचानक; कतरनी-कैंची; उद्यत-तत्पर; पृथक्- अलग; हस्तक्षेप- दखल; विटप-पेड़;

वृथा-व्यर्थ, बेकार; दयानतदार- ईमानदार; क्लान्त-दुःखी; नासूर-कभी न भरने वाला घाव;

निढाल-बहुत थकी हुई; भावावेश- भावों की प्रबलता; ड्योढ़ी-दहलीज, देहरी; अबरा-ऊपर का पल्ला।

शीर्षक की सार्थकता
परिवारिक पृष्ठभूमि पर आधारित एकांकी है | इस एकांकी में संयुक्त परिवार के महत्त्व को दिखाया गया है |

दादा मूलराज वट वृक्ष को अपना आदर्श (ideal) मानते है | वट वृक्ष  संयुक्त परिवार का रूपक (Metaphor )  है |

जिस तरह विशाल वट वृक्ष की डालियाँ जब उसके साथ रहती हैं तब हरी-भरी रहती हैं, जब वृक्ष से अलग हो जाती हैं

तो सूख जाती हैं | उनका अपना कोई अस्तित्व नहीं रहता | यही बात दादाजी समझाना चाहते हैं।

एक संयुक्त परिवार में भी सभी सदस्यों के मिलजुलकर एक साथ रहने में ही खुशहाली बनी रहती है

जहाँ सब अलग-अलग हुए, तो सब टूटकर बिखर जाते हैं |

दादाजी के धैर्य एवं समझदारी से अन्ततः बेला परिवार को अपना मानने लगती है |

इस प्रकार एकांकी का शीर्षक सूखी डाली' पूर्णतया उचित है ।

एकांकी का उद्देश्य
उपेन्द्रनाथ 'अश्क' द्वारा रचित ‘सूखी डाली' का उद्देश्य वर्तमान समय में संयुक्त परिवार के महत्त्व को दर्शाना है।

यद्यपि संयुक्त परिवार में  कुछ खट्टे-मीठे पल आते रहते हैं, लेकिन हमें संयम व पारस्परिक सहयोग में

सद्भावना बनाए रखना चाहिए। 

परिवार के मुखिया को दादाजी के समान परिवार के प्रत्येक सदस्य की भावनाओं का सम्मान करते हए

अपनी सोच व व्यवहार में समय के साथ आधुनिकता का समावेश भी करना चाहिए। 

परिवार में नए आए सदस्यों व अन्य सदस्यों में आपसी सामंजस्य बैठाने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि

संगठन में ही शक्ति है। 

अलग-अलग होकर हमारा विकास बाधित और व्यक्तित्व कंठित हो जाता है।

अतः आपसी सहयोग, प्रेम, दया, आदर आदि मूल्यों का जीवन में विकास करते हए मिलकर रहने की प्रेरणा

देना ही इस एकांकी का उद्देश्य है।



मुख्य पात्रों का चरित्र-चित्रण

दादाजी मूलराज-

दादा मूलराज एकांकी के सबसे प्रमुख और वरिष्ठ पात्र हैं। उनकी आयु 72 वर्ष है। इतनी आयु होने पर भी

वे पूर्णतः स्वस्थ हैं। वे एक परिश्रमी, बुद्धिमान, दूरदर्शी, अनुभवी व्यक्ति हैं।

उन्होंने अपने परिश्रम के बल पर ही सरकार से प्राप्त एक मुरब्बा जमीन को 10 मुरब्बा बना लिया।

वे एक बेटे-पोतों आदि से भरे परिवार के मुखिया हैं। उन्होंने पूरे परिवार को अपनी सूझबूझ से एक सूत्र में बाँध

रखा है। परिवार का कोई सदस्य उनके निर्णय की अवहेलना नहीं करता। परेश द्वारा छोटी बहू के असंतोष

के बारे में जानकर वे तुरन्त परिवार के सभी सदस्यों को उचित दिशा-निर्देश देते हैं।

वे मुखिया के कर्तव्यों से भली-भाँति परिचित हैं। वे सबके लिए प्रेरणास्रोत हैं।




बेला-

बेला एकांकी की प्रमुख महिला पात्र है। वह दादाजी के संयुक्त परिवार की छोटी बहू और परेश की पत्नी है।

वह एक सम्पन्न व प्रतिष्ठित परिवार की सुशिक्षित व इकलौती संतान है।

अतः वह अपने ससुराल में मायके की अक्सर प्रशंसा करती है।

उसकी यह बात परिवार के सदस्यों को पसंद नहीं आती।

वह मूलराज जी के संयुक्त परिवार में सामंजस्य नहीं बैठा पाती और सबके उपहास व व्यंग्य बाणों की पात्र

बन जाती है। इसलिए वह परिवार से अलग रहने के लिए परेश से कहती है। लेकिन दादाजी (मूलराज) के

हस्तक्षेप से परिवार के सदस्यों में बदलाव देख वह सबके साथ मिलकर कार्य करती है।

पूरी एकांकी बेला के इर्द-गिर्द ही घूमती है। वह एक समझदार, पढ़ी लिखी, कुशल, आधुनिक नारी है।


मंझली बहू-

मंझली बहू दादा मूलराज के मंझले बेटे कर्मचन्द की पत्नी है। वह बहुत हँसमुख स्वभाव वाली है।

वह इन्दु के साथ मिलकर बेला का मजाक उड़ाती है, लेकिन दादाजी के समझाने पर कि मजाक उतना ही

करो कि दूसरे उसे सहन कर सकें। घर के लोगों के पूर्णतयाः घर का अंग बनने से पहले उन्हें अपनी हँसी का

निशाना मत बनाओ। वह समझ जाती है और अपने व्यवहार में सुधार लाती है।










पाठ पर आधारित प्रश्न

उत्तर लिखिए -

निम्नलिखित अवतरणों को पढ़िए और दिए गए प्रश्नों के

I. बेटा, बड़प्पन बाहर की वस्तु नहीं - बड़प्पन तो मन का होना चाहिए और फिर बेटा घृणा को घृणा से

नहीं मिटाया जा सकता। बहू तभी पृथक् होना चाहेगी जब उसे घृणा के बदले घृणा दी जाएगी। लेकिन

यदि उसे घृणा के बदले स्नेह मिले तो उसकी समस्त घृणा धुंधली पड़कर लुप्त हो जाएगी।

(ICSE 2019)

(i) प्रस्तुत कथन का वक्ता कौन है? उसका संक्षिप्त परिचय दीजिए। (2)

उत्तर- प्रस्तुत कथन के वक्ता दादाजी मूलराज हैं। वह एक धनी तथा प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। उनके पास

ज़मीन-जायदाद है, फार्म, डेयरी तथा चीनी के कारखाने हैं, जिनकी देखभाल उनके दो बेटे तथा पोते करते हैं।

वे एक बड़े से परिवार के मुखिया हैं। उनकी उम्र 72 (बहत्तर) वर्ष है। वे शरीर से स्वस्थ तथा हृष्ट- पुष्ट हैं |

(ii) श्रोता ने वक्ता को छोटी बहू के संबंध में क्या बताया था? (2)
उत्तर - श्रोता कर्मचंद ने दादा जी को यह बताया कि छोटी बहू परिवार में खुश नहीं हैं शायद परेश और वो

अलग होना चाहते हैं। दादाजी के पूछने पर करमचंद ने कहा कि जहाँ तक मेरा विचार है कि छोटी बहू के मन

में दर्प की मात्रा जरूरत से कुछ ज्यादा है।मैंने वह  मलमल के  थान और रजाई के अबरे ला कर दिए थे ।

सब ने तो रख लिए पर छोटी बहू को पसंद नहीं आए।

वह अपने मायके के घराने को शायद इस घराने से बड़ा समझती हैं और इस घर को घृणा की दृष्टि से देखती है|





(iii) वक्ता ने परिवार में एकता बनाए रखने का क्या उपाय निकाला ? क्या वे इसमें सफल हुए? स्पष्ट कीजिए। (3)

उत्तर - दादाजी बहुत अनुभवी, समझदार तथा दूरदर्शी व्यक्ति थे। वे परिवार में एकता और अखंडता बनाये रखने में

विश्वास रखते थे। जब उन्हें कर्मचंद से पता चला कि छोटी बहू परिवार में खुश नहीं है तो उन्होंने उसे छोड़कर

परिवार के सभी सदस्यों को अपने पास बुलाया और उनसे कहा कि मुझे यह जानकर बड़ा दुख हुआ कि छोटी

बहू का यहाँ मन नहीं लगा। इसमें दोष उसका नहीं, हमारा दोष है। वह एक बड़े घर की बेटी है। अत्यधिक

पढ़ी-लिखी है। सबसे आदर पाती और राज करती आई है। यहाँ उसे हर एक का आदर करना पड़ता है।

छोटी बहू अपनी बुद्धि और योग्यता में निश्चय ही हमसे बड़ी है। हमें उसे आदर देना चाहिए तथा उसके गुणों से

लाभ उठाना चाहिए। मेरी यह इच्छा है कि सब उसका कहना मानें, उससे परामर्श लें और उसका काम भी

आपस में बाँट लें। उसे पढ़ने-लिखने का अधिक अवसर दें।
जी हाँ, दादाजी का यह उपाय पूर्णतया सफल हुआ। छोटी बहू को मान-सम्मान तथा प्रेम मिला।

वह भी परिवार के साथ मिलकर रहना और काम करना सीख गई। इस प्रकार परिवार बिखरने से बच गया।

(iv) प्रस्तुत एकांकी किस प्रकार की एकांकी है? इस एकांकी लेखन का क्या उद्देश्य है? (3)

प्रस्तुत एकांकी संयुक्त परिवार प्रणाली पर आधारित पारिवारिक , सामाजिक एवं एक शिक्षाप्रद एकांकी है,

जिसमें संयुक्त परिवार की समस्याओं को दर्शाया गया है। बड़े परिवार में भिन्न-भिन्न स्वभाव के लोग होते हैं।

उनमें वैचारिक मतभेद भी हो जाते हैं जो आपसी कलह तथा ईर्ष्या-द्वेष का कारण बनते हैं।

परिवार में प्रेम, अनुशासन, तथा आपसी सूझ-बूझ से एकता और अखंडता बनाए रखी जा सकती है।

परिवार के मुखिया को समझदार, दूरदर्शी तथा निष्पक्ष स्वभाव का होना चाहिए ताकि वह परिवार के सदस्यों में

ताल-मेल बैठा सके। जैसे कि दादाजी ने छोटी बहू और परिवार के सदस्यों के बीच ताल-मेल बिठाया।
परिवार में नई आई बहू भिन्न परिवेश की होने के कारण समायोजन करना सीख नहीं पाती। उसे प्रेम तथा आदर

देकर परिवार के माहौल में ढालना चाहिए। बहू को भी बात-बात पर मायके से तुलना नहीं करनी चाहिए तथा

व्यंग्यात्मक बातों से बचना चाहिए। इस प्रकार एकांकीकार अपने उद्देश्य की पूर्ति करने में सफल हुए हैं।

II. "मेरी आकांक्षा है कि सब डालियाँ साथ-साथ फलें -फूलें, जीवन की सुखद, शीतल वायु के स्पर्श से झूमें

और सरसराएँ। विटप से अलग होने वाली डाली की कल्पना ही मुझे सिहरा देती है।" (ICSE 2017)

i)  उपर्युक्त कथन कौन, किससे किस संदर्भ में कह रहा है?

उत्तर-  उपर्युक्त कथन दादाजी ने इन्दु और मँझली बहू से कहा। जब दादाजी को पता चला कि छोटी

बहू घरवालों के व्यवहार से परेशान होकर परिवार से अलग अपनी गृहस्थी बसाना चाहती है तो दादाजी ने सभी

परिवारवालों को छोटी बहू के साथ अच्छी तरह पेश आने को कहा तथा इन्दु और मंझली बहू को विशेष हिदायत

देते हुए उन्होंने उपर्युक्त कथन कहा।

ii)  सब डालियाँ साथ-साथ फलने-फूलने से क्या आशय है? 'डालियाँ' शब्द किसके लिए प्रयुक्त हुआ है? (2)

उत्तर - सब डालियाँ साथ-साथ फलने-फूलने से आशय है कि परिवार का हर एक सदस्य खुश एवं सुखी रहे।

एकता के सूत्र में बँधकर एक-दूसरे को समझकर कार्य करें। डालियाँ शब्द घर के सदस्यों के लिए प्रयुक्त हुआ है।
(iii)  किसकी आकांक्षा है कि सब खुशहाल रहें और क्यों? इस एकांकी से आपको क्या शिक्षा मिलती है? (3) 

(iv)  प्रस्तुत कथन से वक्ता की किस चारित्रिक विशेषता का पता चलता है? अपने विचार भी प्रस्तुत कीजिये। (3)
उत्तर- प्रस्तुत कथन से वक्ता की दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक एवं सूझ-बूझ जैसी चारित्रिक विशेषता का पता चलता है।

दादाजी ने अपने परिवार को एकता के सूत्र में बाँध रखा है। परिवार में भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के स्वभाव में भिन्नता

होने पर भी दादा जी एकता की एक ऐसी डोर हैं, जिन्होंने अपने पूरे परिवार को एकता के सूत्र में बाँध रखा है।

दादाजी एक परिपक्व बुद्धि के स्वामी हैं जो एक ऐसा उपाय ढूँढ निकालते हैं कि गृहकार्य में सहयोग न करने

वाली स्त्री भी घर के कार्यों में स्वेच्छा से सहयोग देने लगती है। संयुक्त परिवार को बनाए रखने में दादा जी ने

कोमल स्वभाव द्वारा कठोरता को जीतने की बात सिद्ध कर दी।



ICSE -24 

Read the extract given below and answer in Hindi the questions that follow: निम्नलिखित अवतरण

को पढ़िए और उसके नीचे लिखें प्रश्नों के उत्तर हिंदी में लिखिए :-

"मुझे किसी ने बताया तक नहीं यदि कोई शिकायत थी तो उसे मिटा देना चाहिए था।

हल्की सी खरोंच भी, यदि उस पर तत्काल दवाई ना लगा दी जाए, तो बढ़कर एक बड़ा घाव बन जाती है

और यही घाव नासूर हो जाता है, फिर लाख मरहम लगाओ ठीक नहीं होता।"
सूखी डाली-  उपेंद्रनाथ अश्क

(i) कथन का वक्ता कौन है? उसका परिचय दीजिए।
(ii) कथन का श्रोता कौन है ? श्रोता ने ऐसा क्या कहा था कि वक्ता को उपुर्यक्त बात कहनी पडी ?
(iii) 'नासूर' शब्द का अर्थ लिखकर बताइए कि इस समस्या के समाधान के लिए वक्ता के क्या विचार है?
(iv) 'सूखी डाली एकांकी किस पृष्ठभूमि पर आधारित है? इसके शीर्षक की सार्थकता पर भी प्रकाश डालिए।

         

उत्तर- परिवारिक पृष्ठभूमि पर आधारित एकांकी है | इस एकांकी में संयुक्त परिवार के महत्त्व को दिखाया गया है |

दादा मूलराज वट वृक्ष को अपना आदर्श (ideal) मानते है | वट वृक्ष  संयुक्त परिवार का रूपक (Metaphor )  है | जिस तरह विशाल वट वृक्ष की डालियाँ जब उसके साथ रहती हैं तब हरी-भरी रहती हैं,

जब वृक्ष से अलग हो जाती हैं तो सूख जाती हैं | उनका अपना कोई अस्तित्व नहीं रहता |

यही बात दादाजी समझाना चाहते हैं। एक संयुक्त परिवार में भी सभी सदस्यों के मिलजुलकर एक साथ रहने में ही

खुशहाली बनी रहती है जहाँ सब अलग-अलग हुए, तो सब टूटकर बिखर जाते हैं | दादाजी के धैर्य एवं समझदारी से

अन्ततः बेला परिवार को अपना मानने लगती है | इस प्रकार एकांकी का शीर्षक सूखी डाली' पूर्णतया उचित है ।



SAMPLE QUESTION: -  

Read the extract given below and answer the questions in Hindi that follow.

निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिंदी में लिखिए। 

"ना बेटा, मैं अपने जीते जी यह सब ना होने दूंगा। तुम चिंता ना करो। मैं सबको समझा दूँगा।" 

- सूखी डाली (उपेंद्र नाथ 'अश्क') Sukhi Daali (Upendra Nath "Ashk")

(i) वटवृक्ष को देखकर दादा जी के मन में कौन-सी कल्पनाएँ जाग जाती हैं ?
(ii) बाबा जी का मन क्या सोचकर सिहर उठता है ? वे किस चिंता में डूबे हैं ?
(iii) दादा जी कैसे विचारों के व्यक्ति हैं ? उनकी क्या अभिलाषा है ?
(iv) अपनी छोटी बहू के विषय में दादा जी के क्या विचार हैं ?

एकांकी का शीर्षक एवं एकांकी उद्देश्य ज़रूर समझ लें | 

             




Wednesday, 12 September 2018

निबंध के कुछ विषय

विषय –
१)एक साहसिक- रोमांचक यात्रा
२)ढाबा –भोजन – ‘स्ट्रीट फूड’ का अनुभव
३)किसी सांस्कृतिक धरोहर –कल्चरल हेरिटेज – का वर्णन
४)विज्ञान –गल्प –साइंस – फ़िक्शन
५)बाल -अपराधी –जुवेनाइल क्रिमिनल की समस्या
६)प्रिय ग्राफिक उपन्यास
७)परिवार में सबसे वृद्ध संबंधी से बात-चीत
८)किसी कलात्मक रचना कर्म –क्रिएटिव एक्टिविटी –नाटक ,संगीत ,पेंटिंग ,शिल्प –कला ,छायांकन में आदि में भाग लेने का आनंद
९)पड़ोसी देश के साथ हुए क्रिकेट मैच का संस्मरण
१०)प्रिय विज्ञापन
११)फेस बुक पर मित्रता -कितनी सार्थकता ?
१२)चाँद के साथ कुछ गप्पें
१३)भूख का अनुभव
१४)बुलिंग- उत्पीड़न- समस्या और समाधान
१५)शापिंग मॉल का आकर्षण
१६)नई फिल्में –बदलती प्रवृतियाँ – लंच बॉक्स से क्वीन तक
१७)मिथक – माइथोलॉजी का महत्त्व
१८)रचनात्मक कार्यों –क्रिएटिव वर्क्स पर प्रतिबन्ध – सेंसरशिप का औचित्य
१९)लालच बुरी बला नहीं बल्कि प्रेरणा है |’’ सहमति –असहमति में तर्क दीजिए |

२०)भारत की भविष्य की राजनीति 

उदय का क्षण

कल की तरह आज भी सूरज निकलेगा ,
होगी प्रदक्षिणा नभ के पथ पर प्रभामयी
जो भाग्यवान हैं उनकी आँखें सींचेंगी
उनकी आभा में शीतल किरणें मृत्युंजयी
कल –बीता हुआ कल ,प्रदक्षिणा –चक्कर लगाना ,नभ -आकाश ,पथ-रास्ता ,प्रभामयी –आलोकित ,भाग्यवान ,खुशकिस्मत ,सींचेंगी-तार रकेंगी ,आभा सुंदरता ,शीतल –ठंडी ,किरणें -रश्मियाँ ,मृत्युंजयी –मृत्यु को जीतने वाली
कवि व्यक्ति के निराश मन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे मन !तू आश्मान पर छाये हुए अंधकार को देखकर मत दुखी मत हो |यह अंधकार जो दुःख और निराशा का प्रतीक है अस्थायी है अर्थात थोड़े समय के लिए ही है |कल की तरह आज फिर सूर्योदय होगा |उदय का क्षण आने ही वाला है |अंधकार जब बहुत गहरा हो जाए तो यह समझना चाहिए कि जल्द ही अब उसको मिटना होगा ,उसका अंत होना निश्चित ही है क्योंकि उसका कुछ समय के पश्चात आकाश मार्ग पर सूर्य की किरणें प्रदक्षिणा करेंगी ,प्रकाश से परिपूर्ण किरणें पूरे आसमान  पर छा जायेंगी |सूर्योदय की सराहना केवल भाग्यशाली ही कर सकेंगे |उनकी आँखे ही सूर्या की ज्योति से प्रभावित हो सकेंगी |सूर्य की आभा दिव्यता प्रदान करने वाली है |प्रातःकालीन किरणें की शीतलता में मृत्यु पर बी विजय पाने की शक्ति है |
जब शाम झुरेगी ,अंधियारा घिर आएगा
तब दिन में खींची हुई किरण चन्दा बन कर ,
बिछ जायेगी उनकी शैया  पर चुपके से
पूरब की गोदी से छनकर |
शाम –संध्या, झुरेगी- धीरे धीरे घिरेगी ,अंधियारा अंधकार ,घिर आना –फैल  जाना  ,चन्दा चन्द्रमा ,शैया –पलंग ,चुपके से –बिना कुछ कहे ,वातायन –खिडकी

जब सान्झ अँधेरे में बदलेगी और सर्वत्र अंधकार छा जाएगा तब दिन में फैली हुई रवि की किरणें चंद्र किरणों का रूप ले लेंगी |ये चंद्र किरणें भी पूर्वा से निकलेंगी और चुपके से (शांत भाव से )जनमानस की सेज पर बिछ जायेंगी |यह चांदनी सभी को शीतलता प्रदान करेगी |तथा समस्त संसार नींद में डूब जाएगा |
हम भले न समझे उदय अस्त का अर्थ मगर ,
हर दिन प्रभात में सृष्टि सहज हँस पड़ती है ,
हर सांझ स्निग्ध आश्वास –मरन  आलस देकर
स्फूर्ति सवेरे तक जीवन की मढ़ती है |

उदय होना –उगना ,अस्त होना –डूबना ,प्रभात –सुबह ,सृष्टि –संसार ,सहज –सरल ,सांझ –शाम ,स्निग्ध –कोमल ,आश्वास –साँसों का आना -जाना ,मरण –मृत्यु ,आलस –सुस्ती ,स्फूर्ति –ताजगी ,मढ़ना आवरणबद्ध करना
हमें पता चले या न चले ,पर सूर्योदय  होते ही पूरी सृष्टि मानो प्रसन्न होकर हँसने लगती है |प्रातः काल जीवन में एक मधुर मुस्कान तथा स्फूर्ति लेकर आता है |शाम होते होते आलस्य छा जाता है तथा शरीर निढाल हो जाता है |अगर सूर्य अस्त न हो तो उसके उदय की महत्ता कैसे जानी जा सकेगी ?अगर अंधकार न हो तो प्रकाश का मूल्य आँकना मुश्किल हो जाएगा |प्रातः से सांझ तक ,स्फूर्ति से आलस्य तक का नियम जीवन को सहज बनाता रहता है |यही प्रकृति का नियम है |
हर परिवर्तन से प्राण शक्ति ले सकते हैं
हर शक्ति स्नेह के चरणों पर चढ़ क्यों न जाय
इसलिए उदय का क्षण जो आने वाला है
पंछी उसमें उल्लास ,गीत यदि नहीं गाय
तो धरती से नभ तक की सारी सृष्टि व्यर्थ
तो नभ से धरती तक का वातावरण लाज ,
तुम उदयकाल में मौन नहीं रह जाना मन
कल के जैसा निकलेगा सूरज अभी आज |
परिवर्तन –बदलाव, शक्ति –ताकत ,स्नेह –प्रेम,चरण -पैर ,क्षण पल ,पंछी –पक्षी ,उल्लास आनंद ,गीत गान ,गाय –गाना ,वातावरण –माहौल ,मौन खामोश ,काल समय

कवि कहते हैं कि प्रकृति में नियमित रूप से होने वाले परिवर्तनों से जीने की प्रेरणा मिलती है और प्राणों को शक्ति मिलती है |आनेवाले सूर्योदय के समय यदि पक्षी अपनी प्रसन्नता के गीत न गायें तो धरती से आकाश तक इस पूरे संसार का  अस्तित्व बेकार है और आकाश से धरती तक का समस्त वातावरण स्वयं को लज्जित अनुभव करेगा |पक्षियों की चहचहाहट ही प्रभात के आगमन का सन्देश देती है |रात्रि की प्रतीक्षा भी मनोहारी ही है क्योंकि वह सुभाह में परिवर्तित होगी और उदय की वह बेला हमारे प्राणों को और अधिक शक्तिशाली बनाएगी |अतः कवि मानव मन को संबोधित काटे हुए कहते हैं कि हे मानव मन ,तुम निराश रहित होकर सूर्योदय की प्रतीक्षा करना तथा सूर्योदय होने पर अपनी प्रसन्नता अवश्य व्यक्त करना |कल की ही भांति आज भी सूर्य उदय होगा और हमारे जीवन में नयी स्फूर्ति का संचार करेगा |